Economic Census Project for Information and Processes

भारत में हर दस साल में जनगणना होती है. मतलब सरकार के पास पूरा ब्यौरा होता है कि देश में पुरुष कितने हैं महिलाएं कितनी हैं और बच्चे कितने हैं. तो सरकार जब कोई योजना बनाती है तो उसे पता होता है कि कितने लोगों के लिए बंधन कितने लोगों को फायदा होगा और कितने लोग ज़रूरतमंद हैं. ठीक ऐसे ही एक होती है इकोनॉमिक गणना या आर्थिक गणना. इसमें भी गिनती ही होती है.




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लेकिन इंसानों की नहीं बल्कि देश में चल रही हर तरह के काम काज की. चाहे वो कितना भी बड़ा या छोटा. जिस किसी भी कामकाज से किसी भी तरह की आर्थिक गतिविधि जुड़ी है उसकी गिनती की जाती है. जैसे खेती से जुड़ी गतिविधियां. लेकिन खेती नहीं. किसी सामान को बनाना या उससे जुड़ी गतिविधियां. किसी सामान को बेचना या उससे जुड़ी गतिविधियां. किसी सेवा को बेचना या उससे जुड़ी गतिविधि. कोई भी ऐसा काम जो आप सिर्फ अपने लिए नहीं करते बल्कि उससे पैसा कमाने के लिए करते हैं. उसकी गिनती इकोनॉमिक गणना में की जाती.




हमारे देश में अब तक 6 इकोनॉमिक गणना हो चुकी है. अब सवाल आता है कि ये इकोनॉमिक गणना क्यों की जाती है. देखिए सरकार का काम है देश को चलाना और देश का विकास करना. यानी देश में रहने वालों की आर्थिक स्थिति रहन सहन का पता कर. ही पता करना कि देश में छोटी मध्यम स्तर की और बड़ी कितनी कारोबार चल रही. लोगों का रुझान किस तरह के कामों में और इन कारोबारों को बढ़ाने में यानी इनका विकास करने में सरकार कैसे मदद कर सकती है. देखिए हम सभी चाहते हैं कि हमारे कामकाज में तरक्की है.और इसमें हमें जो भी मदद मिल सकती है वो मिल. हम सब चाहते हैं कि सरकारी योजनाएं ऐसी बनें जिनसे हमें अपने कामकाज में मदद मिले.




लेकिन सरकार तो हमारी काम की योजनाएं तभी बना सकती है न जब उसे पता हो कि देश के नागरिक किस तरह का काम करते हैं. अगर आप ठीक से बताएंगे कि आप किस तरह का काम करते हैं. उससे कितनी आमदनी होती है. उस काम की तरक्की की क्या संभावनाएं. उस काम में कितने लोग लगे हुए हैं. उसको आप कहा करते हैं. यानी. घर से करते हैं या बाहर से करते हैं या आपका कोई ऑफिस या गोदाम है. तो सरकार इन सब आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनाएगी.